महात्मा गांधी जी(पूर्ण जोर ना देना)
दोनों के बीच कई चीजे एक समान थी जिनमें देश के सामान्य
हितों को अहमियत देना भी शामिल था आजादी कों लेकर उनका विचार सिर्फ राजनीतिक नहीं
था दोनों चाहते थे की देश की जनता शोषण की बेरियों से मुक्त हो और इसी दिशा में
उनके प्रयास रहे दोनों में एक चीज विरोधाभाषी थी लेकिन इसके बावजूद दोनों में कुछ
समम्नताए भी थी भगत सिंह नास्तिक थे और गांधी जी परम आस्तिक लेकिन धर्म के नाम पर
फैलाई जाने वाली नफरत के दोनों ही खिलाफ थे।
देश्वसियों को पूरा विश्वास था की भगत सिंह को कोई बच्चा
सकता है तो वो सिर्फ गांधी जी है इसलीय देश की जनता गांधी जी पर पूरा भरोसा करती
है की वो कुछ भी करके तीनों वीरों को बचा लेंगे। गांधी जी ने यहा तक बोल दिया था
की मैं भगत सिंह को बचाने के लिय अपना जीवन भी कुर्बान कर सकता हु। लेकिन महात्मा
गांधी जी ने अपना पूर्ण जोर इसलीय नहीं लगाया क्योंकि वह खुल कर भगत सिंह के
हिंसात्मक क्रांतिकारी योगदान का समर्थन नहीं करना चाहते थे क्योंकि उन्हे मालूम
था की भगत सिंह खुद को बचना नहीं चाहते थे उनकी जिद्द थी की वो फासी पर चढ़ेंगे।
शुभस चंद्र बौस ने तो बोल दिया था गांधी जी को इरविन से कीय गए समझौते को
तौर देना चाहिए और तीनों वीर पुत्रों की फासी को रुकवा देना चाहिए।
गोलमेंज सम्मेलन :-
गांधी जी ने भगत सिंह की फासी को रोकने में पूर्ण जोर क्यों नहीं दिया इसके कई
कारण थे जैसे की साल 1930 में दांडी कूच के
बाद कोंग्रेस और अंग्रेज सरकार के बीच संघर्ष जोरों पर था इस बीच भारत की राज्य
व्यवस्था में सुधार पर विचार के लिय ब्रिटेन की सरकार ने अलग अलग नेतऔ को गोलमेंज
सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिय लंदन बुलाया। पहले गोलमेंज सम्मेलन में गांधी जी
और कोंग्रेस ने हिस्सा नहीं लिया था यह सम्मेलन बेनतीजा रहा, दूसरे सम्मेलन में ब्रिटेन
सरकार ने पहले सम्मेलन जैसी स्थिति से बचने के लिय संघर्ष की जगह बातचित के रास्ते
पर चलने का फैसला किया।
17 फरबरी 1931 में वायसराय इरवीन और गांधी जी
के बीच बातचित की शुरुआत हुई इसके बाद 5 मार्च 1931
को दिल्ली में एक समझौता हुआ जीसे हम लोग दिल्ली पैक्ट
और गांधी इरविन समझौता के नाम से जानते है दोनों के बीच समझौता हुआ,
इरवीन चाहते थे कि गांधी जी इस मसले से जितना दूर रहे उतना ही अच्छा है इसलीय
इरविन ने गांधी के सामने प्रस्ताव रखा की आप लंदन चले जाइए, और गांधी जी इरविन को
मना नहीं कर पाए और लंदन जाने के लिय मान गए, लेकिन उन्होंने शर्त रखा की जीतने भी
अपराधी जेल में है अगर आप उन्हे छोर देंगे, ताभि हम लंदन में भाग लेने जाएंगे,
इरविन ने यहा पर शातिर चाल चलते हुए कहा की जीतने भी राजनीतिक
कैदी है (वो कैदी जो आंदोलन में शामिल है) हम सब को रिहा कर देंगे,
गांधी जी यहा पर गलती करते है समझने में की भगत सिंह तो बम फ़ैकने के मामले
में बंदी है न की राजनीतिक कैदी के रूप
में इसका मतलब की भगत सिंह पर आपराधिक मुकदमा
था।
गांधी चले जाते है तब उनको मालूम होता है की भगत सिंह पर तो
कोई राजनीतिक मुकदमा ही नहीं था इसका मतलब गांधी ने गलती की थी उनको स्पष्ट कहना
चाहिए था की आप लोग भगत सिंह को छोरेंगे या नहीं। गलती इसलीय हुई क्योंकी गांधी जी
को लगा की भगत सिंह ने बम से किसी की जान तो नहीं लिया था इसलीय गांधी जी ने भगत
सिंह को राजनीतिक कैदी मानकर समझौते को स्वीकारा था।
इस समझौते में अहिंसक तरीके से संघर्ष करते हुए पकरे गए सभी
कदियों को छोरने की बात तय हुई। मगर राजनीतिक हत्या के मामले में फासी की सजा पाने
वाले भगत सिंह को माफी नहीं मिल पाई भगत सिंह के अलावा तमाम दूसरे कदियों को भी
एसे मामले में माफी नहीं मिल सकी, और यही से यह विवाद शुरू हुआ।
इस दौरान यह सवाल उठाया जाने लगा की जिस समय भगत सिंह और
उनके दूसरे साथियों को सजा दि जा रही है तब ब्रिटेन सरकार के साथ समझौता कैसे किया
जा सकता है, इस मामले से जूरे सवालों के साथ हिंदुस्तान में अलग अलग जगहों पर
पर्चे बाटे जाने लगे, साम्यवादी इस समझौते से नाराज थे और सार्वजनिक साभाओ में
गांधी जी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने लगे। तीनों वीर की फासी के बाद जनता में
आक्रोश दौर गया और यह आक्रोश केवल अंग्रेजों के लिय नहीं बल्कि गांधी जी के लिय भी
था क्योंकी उन्होंने इस बात के लिय आग्रह नहीं किया की भगत सिंह कि फासी माफ हो
नहीं तो समझौता नहीं होगा।
पूरी तरह से गांधी जी को भी हम गलत नहीं कह सकते है, क्योंकी
अंग्रेजों को लगता था की हमें कैसे भी करके भगत सिंह को खत्म करना ही होंगा क्योंकी
भगत सिंह उनके के लिय सरदर्द बन चुके थे। यानि वह तो किसी की सुनने ही वाले नहीं
थे उनका फैसला अटल था। अंग्रेजों के अटल निश्चय के रूप में हम देख सकते है की
उन्होंने तो गांधी जी को भी मरवाने का फैसला कर लिया था जब वह 1942 में आमरण अनशन
पर बैठ गए थे भारत छोरों आंदोलन में। अंग्रेजों
ने गांधी जी को सपष्ट कह दिया था की हम इस बार आपकी नहीं सुनेंगे तब गांधी ने अपने
अनशन को अधूरा छोर कर 14 दिनों बाद खुद खाना खाकर अपना अनशन तोर था।
लोगों के गुस्से का कारण यह भी था की “आप वकील होकर भी अंग्रेजों के सड़यंत्र को नहीं समझ पाए तो
हम जैसे आम इंसान कैसे समझेंगे”। लेकिन महात्मा जी को यह नहीं पता था
की उस बम धमाके की जगह Saundrs की हत्या
को लेकर अंग्रेजों ने सारी कार्यवाही की थी और भगत सिंह ने खुद अपनी गिरफ़्तारी दि
थी।
1931 की 26 मार्च के दिन कराची
में कोंग्रेस का अधिवेशन शुरू हुआ जिसमें पहली और आखिरी बार सरदार वलभ भाई पटेल अध्यक्ष बने 25 मार्च को गांधी जी जब इस अधिवेशन के लिय हिस्सा
लेने पहुचे तो उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया गया उनका स्वागत काले कपरे से बने फूल और “गांधी मुर्दाबाद और गांधी गो
बैक” जैसे नारों से किया गया। कई जगहों पर गांधी जी पर हमला भी किया
गया था लेकिन सदी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने उन्हे बचा लिया। इस विरोध को गांधी जी ने उनकी गहरी व्यथा
और उनसे उभरे ने वाले गुस्से का हल्का प्रदशन बताया और उन्होंने कहा की इन लोगों
ने बहुत ही गौरव भारी शैली में अपना गुस्सा दिखाया है।
अखबारों की रिपोर्ट के अनुसार 25 मार्च को दोपहर में कई लोग उस जगह पहुच गए
जहा पर गांधी जी ठहरे हुए थे रिपोर्टों के अनुसार ये लोग चिल्लाने लगे की कहा है
खूनी तभी उन्हे जवाहर लाल नेहरू एक तंबू में
ले गए इसके बाद तीन घंटे तक बात चित करके इन लोगों को समझाया लेकिन शाम को ये लोग
फिर से विरोध करने के लिए लौट आये
गांधीजी, इरवन समझौता :- कोंग्रेस के अंदर शुभास चंद्र
बॉस संग कई लोगों ने भी गांधीजी और इरवन समझौते का विरोध किया वह मानते
थे की अंग्रेज सरकार अगर भगत सिंह की फासी की सजा को माफ नहीं कर रही थी तो समझौता
करने की कोई जरूरत नहीं थी हालांकि कोंग्रेस वर्किंग कमेंटी पूरी तरह से गांधी जी
के समर्थन में थी।
यंग इंडिया :- गांधी
जी ने यंग इंडिया में लिखते हुए अपना पक्ष रखा था की कोंग्रेस वर्किंग कमेंटी भी
मुझ से सहमत थी हम समझौते के लिय इस बात की शर्त नहीं रख सकते थे की अंग्रेजी
हुकूमत तीनों वीरों की सजा कम करे मैं वायसराय के साथ इस विषय पर अलग से बात कर
सकता था। गांधी जी इस मुद्दे पर प्रतिक्रियए भी देते है भगत सिंह की बहादुरी के
लिय हमारे मन में भी सम्मान उभरता है लेकिन
मुझे एस तरीका चाहिए जिसमें खुद को न्यौछावर करते हुए दूसरों को नुकसान न पहुचए वो
कहते है की सरकार उन्हे गंभीर रूपसे उकसा रही है लेकिन समझौते की शर्तों में फासी
रोकना शामिल नहीं था इसलिए इससे पीछे हटाना ठीक नहीं।
स्वराज :- गांधी
जी अपनी किताब स्वराज में भी लिखते है की मौत की सजा नहीं दि जानी चाहिए थी। वह
लिखते है की भगत सिंह और उनके साथियों के साथ मुझे बात करने का मौका मिला होता तो
मैं उनसे कहता की उनका चुना हुया रास्ता गलत और असफल है ईश्वर को साक्षी रख कर मैं
यह सत्य जाहीर करना चाहता हु की हिंसा के मार्ग पर चल कर स्वराज नहीं मिल सकता
सिर्फ मुशकीले मिलती है
आखिरी पत्र :- गांधी 22 मार्च को इरविन से मिले थे वायसराय ने वादा भी
किया था की वह इस पर विचार विमर्श करेंगे। उन्होंने आगे लिखा की मैं जीतने तरीकों
से वायसराय को समझा सकता था मैने कोशीश की मेंरे पास समझाने की जितनी सकती थी वो
मैने इस्तेमाल की इसलीय 23 मार्च की सुबह मैने वायसराय को एक आखिरी
भावपूर्ण निजी पत्र लिखा जो की दबाव बनाने के लिय थी, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी
थी जिसमें मैने अपनी पूरी आत्मा समा दि थी। क्योंकी 24 मार्च को फासी त्य थी।
गांधी जी ने निजी तौर पर एक दोस्त की तरह वायसराय को यह चिट्ठी लिखी थी। भगत सिंह
अहिंसा के पुजारी नहीं थे लेकिन हिंसा को धर्म भी नहीं मानते थे तीनों वीरों ने
मौत के डर को भी जीत लिया था उनकी वीरता को नमन है लेकिन उनके कृत्य का अनुकरण
नहीं किया जाना चाहिए उनके इस कृत्य से देश को फायदा हुआ हो एसा मैं नहीं मानता।
वरना खून करके शौहरत हाशील करने की प्रथा अगर शुरू हो गई तो सभी लोग एक दूसरे के
कत्ल में न्याय तलाशने लगेंगे। जब जनता का मूड, माहौल शांति और क्रांतिकारियों के
हिंसा के रास्ते पर लौटालने की तमाम गिनतिया गिनाकर गांधी ने अपील की और कहा सजा
रोक दीजिए। लेकिन उन्हे मालूम नहीं था की तीनों वीरों को उसी शाम फासी दे दिया
गया। “गांधी जी ने वायसराय पर पूरी तरह से दबाव बनाया हो” इस तरह के कोई भी
सबुत सोधकर्ताओ को नहीं मिल है। इस विषय पर मौजूद रिसर्च के आधार पर ये कहा जा
सकता है की फासी के दिन से पहले गांधी और वायसराय के बीच जो चर्चा हुई उसमें भगत
सिंह के फासी के मुद्दे को गांधी जी ने गैर जरूरी समझा इसलीय गांधी जी द्वारा
वायसराय को अपनी पूरी शक्ति लगा कर समझने का प्रयास का दावा सही नहीं जान परत है।
लोगों की विरोध की लहर को देखते हुए गांधी जी ने अपने खिलाफ विरोध और नींद को अपने
ऊपर लेते हुए अपने विचार लोगों के सामने रखे। भगत सिंह की बहादुरी को मानते हुए
उन्होंने उनके मार्ग का स्पष्ट शब्दों में विरोध किया और गैर कानूनी बताया। एक
नेता के तौर पर गांधी जी की नैतिक हिम्मत याद रखने लायक है।
इस पुर मुद्दे पर अगर गांधी जी के बर्ताव को ध्यान में रखा
जाए तो उनका पक्ष समझ जा सकता है भगत सिंह खुद अपनी सजा माफी की अर्जी देने के लिए
तैयार नहीं थे जब उनके पिता ने इसके लिय अर्जी लगाई तो उन्होंने बेहद करे शब्दों
में पत्र लिखकर इसका जवाब दिया गांधी जी उनकी सजा माफ नहीं करवा सके, इसे लेकर
गांधी जी से भगत सिंह की नाराजगी से जूरे साक्ष नहीं मिले है भगत सिंह के स्वभाव
को देखते हुए लगता नहीं की उन्हे ये बात बुरी लागि होगी की उनकी सजा माफ नहीं कराई
गई।
संप्रदाइकता और राष्ट्रवाद की मिलावट की जरे इतनी पुरानी
है, ये इससे जाहीर होता है की भगत सिंह की फासी के बाद संप्रदाइकता को अनिवार्य बनाने
की वजह से कानपुर में सम्प्रदाईक दंगे हुए
जिन्हे रोकने के लिय जा रहे गणेश शकंर नाम
के विध्यारती की मौत हो गई। अब सवाल ये है की भगत सिंह की सजा के मुद्दे पर गांधी
जी की नींदा भगत सिंह के प्रती प्रेम से हुई है या गांधी जी के खिलाफ द्वेष के
कारण। भगत सिंह के नाम को केवल प्रतीक बना कर इस्तेमाल करने वाले मुख्यतः गांधी जी
का विरोध करने के लिय करते है या फिर नारे बाजी करने वाले कहते है की भगत सिंह वामपंथी, नास्तिक, बौद्धिक और सम्प्रदाईकता विरोधी
थे। भगत सिंह और बटुककेश्वर दत के असेंबली हौल में बम फ़ैकने के वक्त शहर के मशहूर लेखक खुशवंत सिंह के पिता
सर शोभा सिंह वहा मौजूद थे इसलिए बाद के सालों में खुशवंत सिंह को नीचा
दिखने के लिये दक्षिण पंथी ताकतों ने ये भी कोशीश कि, की खुशवंत सिंह के पिता के
गवाही के कारण भी भगत सिंह को फासी हुई थी। असल में भगत सिंह को बम फ़ैकने के लिय
नहीं बल्कि Sanduras की हत्या के केस में फासी हुई थी और उस
मामले में शामिल नहीं थे सबसे अजीब बात तो ये है की भगत सिंह की फासी में सबसे बरी
भूमिका सरकारी गवाह बने उनके कइ क्रांतिकारी साथियों की थी इनमें से एक जय गोपाल की गलती के कारण स्कॉट के बदले Sanduras
की मौत हुई थी। इतने सालों से भगत सिंह की मौत पर गांधी जी की नींद
की गई मगर भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने वाले उनके क्रांतिकारी साथियों की कभी
नींद नहीं हुई क्योंकी इससे राजनीतिक फायदा नहीं होता।
आखिरी कोशीश
वकील आशिफ आली :-
गांधी जी ने फिर भी कोशीश नहीं छोरी उन्होंने एक वकील आशिफ आली को तीनों वीरों से
मिलने के लिय जेल भेजा वह एक वादा चाहते थे की वो लोग हिंसा छोर देंगे गांधी जी को
लगा की एसा वादा मिल जाता है तो शायद अंग्रेज मान जाए इस बारे में आशिफ आली ने खुद प्रैस वालों को बताया था
उन्होंने प्रैस में कहा था, मैं दिल्ली से लाहौर आया ताकि भगत सिंह से मिल सकु मैं
भगत सिंह से एक चिट्ठी लेना चाहता था जिसमें
रेवुलेशनरी पार्टी और उनके साथियों
के नाम होते जिसमें भगत सिंह अपने क्रांतिकारी साथियों से कहते की वो हिंसा का
रास्ता छोर दे मैने भगत सिंह से मिलने की हर मुमकिन कोशीश की लिकीन कामयाब नहीं हो
पाया।
प्रोफेशर कपिल कुमार :- वही
दूसरी तरफ प्रोफेशर कपिल कुमार की किताब के अनुसार लाहौर जेल के जेलर ने भी गांधी
जी को पत्र लिखकर पूछा था की इन लोगों को फासी देने में कही देश का माहौल तो नहीं
बिग्रेगा तब गांधी जी ने कहा था की आप अपना काम करे एसा कुछ नहीं होगा।
मरशीपीटीशन :- पंडित मदन मोहन मालवीय ने 14 फरबारी 1931 को भगत सिंह और उनके साथियों की फासी
रुकवाने के लिय लॉर्ड इरविन के सामने मरशीपीटीशन दायर की थी तब इरविन ने कहा था की
आप कोंग्रेस के पूर्व अध्यक्ष है इसलीय
आपको इस मरशीपीटीशन के साथ 20 अन्य कोंग्रेस सदस्यों के भी सहमति पत्र लाने
होंगे। मालवीय जी ने गांधी जी और नेहरू
से भी इस बारे में बात की तो उन्होंने इस बात पर सहमति नहीं जताई। इसलिए मलविया जी
को अन्य कोंग्रेस सदस्यों के सहमति भी नहीं मिली रिटायर होने के बाद मालवीय जी ने
लंदन में कहा था की हम जरूर तीनों वीरों की फासी रुकवा सकते थे अगर गांधी और नेहरू
चाहते तो पर उन्होंने ऐसा नहीं किया।
जितेंद्र नाथ सानयाल
वही दूसरी तरफ भगत सिंह के मित्र जितेंद्र नाथ सानयाल ने
अपनी किताब में इस बात का खुलासा किया है की अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह की फासी
माफ कर दि थी सनयल भगत सिंह के साथ लाहौर की एक घटना में सहआरोप थे, अदालत ने उनको
इस मामले में बरी कर दिया था। इसके बाद उन्होंने भगत सिंह पर एक पुस्तक लिखी थी जो
प्रकाशन से पहले ही जब्त कर ली गई थी।
काला पानी की सजा :- इसी पुस्तक
में इस बात का खुलासा किया गया था की वायसराय लॉर्ड इरविन ने भगत सिंह की सजा को
काला पानी की सजा में बदल दिया था वायसराय ने इसके आदेश भी जारी कर दिए थे अंग्रेज
सरकार द्वारा सानयाल की किताब जब्त किए जाने के बाद उन्होंने इसे फिर दूसरे रूप
में प्रकाशित कराया और उसका नाम रखा गया “अमर शहीद
सरदार भगत सिंह”। फासी से पहले देश भर में सजा माफ करने के लिय आंदोलन
हो रहे थे इसको देखते हुए तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने भगत सिंह की सजा को
काला पनि की सजा करने का आदेश दे दिया था इसकी सूचना पंजाब सरकार को तार से देने
के लिए कहा गया था। पुस्तक में बताया गया है की चीफ
सेक्रेट्रि ने यह संदेश भेज भी दिया था उसी समय एक और आधीकड़ी ने पोस्ट मास्टर को यह संदेश देर से भेजने की सलाह दि।
तीन विकल्प :- सानयल ने अपनी पुस्तक में लिखा है की वायसराय लॉर्ड इरविन ने भगत सिंह की फासी के कई दशक के बाद अपनी आत्मकथा लिखी उसमें इस घटना क्रम की जानकारी और लोगों के नाम लिखे गए है तत्कालीन वायसराय ने अपनी जीवनी में लिखा है की उनके पास तीन विकल्प थे। जो की दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहल्य में रखे कागजात इस बात की पुष्टि करते है। जैसे:-
- सजा माफ़ ना किया जाए और फासी होने दिया जाए।
- यह आदेश बदल दिया जाए और भगत सिंह की सजा को घटा दिया जाए
- कराची में होने वाले कोंग्रेस अधिवेशन तक इस मामले को टाल दिया जाए।

Comments
Post a Comment
If you have any doubts, Please let me know.