भगत सिंह की फांसी होने के बाद उनके परिवार वाले कहा गए, क्या हुआ उन सब का। जब भगत सिंह की फांसी हुई तो उनके पिता जी और उनकी माता जी जीवित थे। भगत सिंह के परिजन लाहौर व लायलपुर में रहते थे यह दोनों ही स्थान अब पाकिस्तान में है। आजादी से पहले का पूरा जीवन इनका वही बीता था।
भगत सिंह कुल 9 - भाई बहन थे
बड़े भाई जगत सिंह : - भगत सिंह के बड़े भाई की मृत्यु 11 वर्ष में ही हो जाती है। जगत सिंह के बाद भगत सिंह का जन्म हुआ था तो अब घर में बारे बेटे का दर्जा भगत सिंह को मिल गया। जीवित 8 भाई - बहनों में भगत सिंह सबसे बड़े थे।
बहन
अमर कौर : - भगत सिंह की बहन अमर
कौर जिनकी शादी लायलपुर में मखन सिंह के साथ हुई थी। जिसे अब फ़ैसलाबाद कहा जाता है।
भाई
कुलबीर सिंह : - भगत सिंह की फांसी के वक्त उनके भाई कुलबीर सिंह की उम्र 14
वर्ष थी।
भाई
कुलतार सिंह : - भगत सिंह के सबसे
छोटे भाई जिनकी उम्र 12 वर्ष थी।
बहन
सुमित्रा कौर : - बहन सुमित्रा कौर
जिनकी उम्र भगत सिंह की फांसी के वक्त 9 वर्ष थी। उनका नाम शादी के बाद प्रकाश
कौर हो गया था।
बहन
शकुंतला कौर : - बहन शकुंतला कौर
जिनकी उम्र उस समय साढ़े 7 साल थी।
भाई
रणबीर सिंह : - जिनकी उम्र करीब 6
साल की थी।
भाई राजेन्द्र सिंह : - 1926 में रणबीर सिंह का जन्म हुआ था जिनकी उम्र करीब साढ़े 4 साल थी।भगत सिंह के फांसी के वक्त और इनका नाम भगत सिंह ने खुद रखा था। अपने साथी क्रांतिकारी, शहीद राजेन्द्र लाहीरी के नाम पर।
ब्रिटिश हूकूमत विरोधी गतिविधियों में भाग लेने के कारण कुलबीर सिंह और कुलतार सिंह को भी ब्रिटिश सरकार ने 6
वर्ष के लिए कारावास की सजा दि थी। आजादी से पहले और
आजादी के बाद भी भगत सिंह के परिवार की खुफिया विभाग से लगातार निगरानी रखी जाती
थी। 1945 में 1 साल के कारावास की सजा बहन अमरकौर को भी
दि गई थी जब उन्होंने जनता को भाषण देते हुए अंग्रेजों के खिलाफ बोला था।
जब देश का विभाजन हुआ तो पंजाब दो भागों में बट गया जिसके बाद लाहौर और फ़ैसलाबाद वाला पंजाब पाकिस्तान में चला गया और बच्चा हुआ आधा पंजाब भारत में रह
गया। जिस कारण भगत सिंह के परिवार वालों ने भारत में रहने
का फैसला लिया। तो जुलाई 1947 में भगत सिंह का पूरा
परिवार पाकिस्तान वाले पंजाब से उठ कर भारत वाले पंजाब खटकरकला में आ गए। खटकरकला इसलीय आ गए क्योंकि यहा उनके पूर्वजों की पुश्तैनी जमीन थी।
यानि भगत सिंह के परदादा पहले खटकरकला में ही रहते थे।
जिसके बाद भगत सिंह के दादा अर्जुन सिंह चले गए थे लायलपुर में यानि आज के फ़ैसलाबाद में। इसके बाद भगत सिंह के पिता जी किशन सिंह संधु
व्यपार के सिलसिले में लाहौर मे रहने आ गए थे। इसका
अर्थ है की भगत सिंह का परिवार मूल रूप से खटकरकला के रहने वाले थे।
बहन अमरकौर
बहन अमरकौर बाद में सितंबर 1947 में लहौर से खटकरकला आई थी। उससे पहले अमर कौर पाकिस्तान के कैम्प राहत सिवीर में रह रही थी। उस समय अमरकौर के साथ उनका बेटा था तथा वह गर्भवती भी थी। ध्यान देने वाली बात यह है की अमर कौर के एक बेटे का नाम जोगिंदर सिंह और एक बेटी का नाम जोगिंदर कौर था। अमर कौर के बेटे जगमोहन सिंह काफी बार चर्चा का विषय रहे है क्योंकि उन्होंने बहुत सारे शोध कीये है भगत सिंह के संबंध मे। इन्होंने I.I.T. खरकपुर से अपनी शिक्षा पूरी की है उसके बाद पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे। जोकी लुधियाना मे रहते है। अमर कौर ने 8 अप्रैल 1983 को संसद में पर्चे फेके थे ठीक भगत सिंह की तरह, क्योंकि उन्हे लगता था की जो कानून आजादी के बाद बने है वो सही नहीं है, साथ ही जिन मानवाधिकारों के लिय जनता को अधिक से अधिक अधिकार देने के लिय मेरे भाई भगत सिंह और उनके साथियों ने जो बलिदान दिया है, सरकार ठीक उसके खिलाफ कदम उठा रही है। जो की जनता के अधिकारों का हनन कर रही है। बहन अमर कौर ने ठीक उसी तारीख को चुना संसद में पर्चे फेकने के लिय, जिस दिन उनके भाई भगत सिंह ने केन्द्रीय असेंबली में बम और पर्चे फेके थे यानि 8 अप्रैल। साथ ही अपनी आवाज को बुलंद करते हुए यह भी कहा की मेरे भाइयों ने इस भ्रष्टाचारी भारत के लिय अपना बलिदान नहीं दिया था। नागरिकों को जिस तरह से परेशान किया जा रहा है। वो बिल्कुल गलत है।
अमर कौर के इस गुस्से का एक और कारण था की उनकी बहन सुमित्रा कौर जिनका नाम अब प्रकाश कौर है उनकी बेटी के देवर की हत्या पुलिसवालों ने कर दि थी पंजाब में। जिसके विरोध में जनता काफी नराज थी। बहन अमर कौर को कॉंग्रेस ने 1952 में टिकट देना चाहा और दिया भी टिकट मगर अमर कौर ने उस टिकट को अस्वीकार कर दिया था।
जुलाई माह में गर्भवस्था में भारत आने के बाद बहन अमर कौर ने 11 ऑकटूबेर 1947 को अपने छोटे बेटे मंदीप सिंह को जन्म दिया था।
बहन प्रकाश कौर
बहन प्रकाश कौर का निधन 28 सितंबर 2014 को कनाडा में हुआ। क्योंकि प्रकाश कौर की शादी राजस्थान में हुई और उसके बाद वह अपने पति के साथ कनाडा में बस चुकी थी। प्रकाश कौर के बरे बेटे का देहांत हो चुका है। उनके छोटे बेटे की दो बेटियाँ है जिनमे से एक भारत में तथा एक कनाडा में ही रह रही है।
भाई कुलबीर सिंह
भाई कुलबीर सिंह की शादी खटकरला में 1954 मे और उनके दो बेटे हुए बबर सिंह तथा अभय सिंह। जिनमे से बबर सिंह का निधन हो चुका है और बबर सिंह का परिवार फरीदाबाद में रहता है। बबर सिह के बेटे है यादवीन्द्र सिंह। दूसरी तरफ अभय सिंह के दो बच्चे है एक बेटा और एक बेटी। बेटे अभीतेज, जिनकी सरक हादसे मे 28 मई 2016 को निधन हो गया। काफी लोगों का मानना था की अभितेज "भगत सिंह की विचारधारा" का प्रतिबिंब है, एसा लोग इसलीय मानते थे क्योंकि अभीतेज में भगत सिंह के लगभग सभी गुण थे। अभीतेज की बहन का नाम ऐनस बेनीपल था।
भाई कुलबीर सिंह 1962 में जनसंघ की टिकट पर फिरोजपुर से विधानसभा का चुनाव लरा था। जीतकर विधायक भी बने और 5 वर्षों तक विधायक रह कर जनता की सेवा करते है बाद में उन्होंने M.P. का भी चुनाव लर लेकिन उसमे असफल रहे। इसका करण था की जनसंघ पार्टी से कुलबीर सिंह ने चुनाव लरा वो तो भगत सिंह के विचारधारा के बिल्कुल विपरीत है फिर एसा उन्होंने क्यू किया। चुनाव हारने के बाद वह वापस अपनी पत्नी तेजी कौर के साथ फिरोजपुर चले गए थे। जो की वर्तमान में चंडीगढ़ में रह रहते है।
भाई कुलतार सिंह
भाई कुलतार सिंह कुलबीर सिंह से दो साल छोटे थे
लेकिन छोटे होने के बावजूद कुलतार सिंह की शादी 1938 में ही हो गई थी। इनके 5 बच्चे हुए थे।
बेटी - वीरेंद्र संधू (1940) ,
इंद्रजीत कौर , कंवलजीत कौर
बेटे - जोरावर सिंह ,
किरणजीत सिंह
भाई कुलतार सिंह अपने परिवार के साथ खटकरकला से सहारनपुर चले गए थे। क्योंकि सभी बच्चों को अपनी आजीविका का साधन विकसित करना था। उस समय देश विकसित होने की राह पर था और ना ही भगत सिंह के परिवार वालों को सरकार की तरफ से कोई आर्थिक सहायता मिली थी। कुलतार सिंह N.D. तिवारी के मंत्रिमंडल में उत्तर प्रदेश के मंत्री भी बने थे।
भाई रणबीर सिंह
भाई रणबीर सिंह जो की सैद्धांतिक रूप से बहुत मजबूत थे तथा अपने भाई भगत सिंह के नकशेकदमों पर चलने का पुरा प्रयास करते थे, क्योंकि उनका मानना था की मैं देश हित में अपना कुछ तो योगदान दे ही सकता हु। जिसके चलते उन्होंने एक विधवा से अंतर-धार्मिक शादी की थी। जिनका नाम था लीला जोकि एक हिन्दू थी, फिर उनके 2 बच्चों का जन्म हुआ था। एक बेटा और एक बेटी। जिनके नाम के पीछे की कहानी भी बहुत ही जबरदस्त थी। रणबीर सिंह धर्मनिरपेक्षता का भी बखूबी पलन करते थे और वह अटल थे अपने सिद्धांतों पे। रणबीर सिंह अपने दोनों बच्चों को अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से पढ़ाया था।
बेटे का नाम था सुनान – सिंगापूर का वह जगह जहा पर शुभाष चंद्र बौस ने आजाद हिन्द फौज के गठन के बाद पहली सभा कि थी। तो उस एतिहासिक जगह के नाम पर रणबीर सिह ने अपने बेटे का नाम सुनान रखा था। जो की दिल्ली में रहते है। वह भारतीय सेना में मेजर जनरल के तौर पर देश की सेवा की। राजीव गांधी के समय में जब श्रीलंका में शान्ति सेना भेजी गई थी उसमे सुनान भी शामिल थे और उनके पराक्रम सम्मान करते हुए उनको वीरचक्र भी दिया गया था।
बेटी का नाम था इसक्रा - लेनिन जो अपना अखबार प्रकाशित करते थे रुश में बोलशविक आंदोलन के दौरान उस अखबार का नाम था इसक्रा। उस अखबार के नाम पर ही रणबीर सिह ने अपनी बेटी का नाम इसक्रा रखा था। जो की अमेरिका में रहती है।
भाई राजेन्द्र सिंह
भाई राजेन्द्र सिंह जिनका नाम भगत सिंह ने
खुद रखा था। वह अपने परिवार के साथ नैनीताल चले गए थे। उनके 2 बच्चे थे जिनका निधन हो चुका है। मगर उनके बच्चे यानि राजेन्द्र सिंह के पोते और पोतिया अभी भी
नैनीताल में है।
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