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Some interesting facts about Bhagat Singh


भागत सिंह के बारे में कुछ गजब के रोचक तथ्य:-

  •    भगत सिंह को हिन्दी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उनहोने बटूकेसवर दत से सीखी थी।
  •  भगत सिंह को प्यार से घर में सब भगू कहकर बुलाते थे।
  • 21 जून 1929 के दिन को भगत सिंह के नाम पर मनाया गया था, अंग्रेजों को यह दर्शाने के लिय की भारतीय जनता भगत सिंह के समर्थन में कुछ भी कर सकती है।
  • फासी के समय भगत सिंह और सुखदेव की उम्र सिर्फ 23 साल थी लेकिन राजगुरु की उम्र 22 साल थी।
  • भगत सिंह के कानूनी सलाहकार दूनी चंद थे तथा ब्रिटिश हुकूमत की तरफ से वकील कार्डन नोंड थे।
  • भगत सिंह पहले आदमी थे जिन्होंने कोंग्रेस पार्टी के डोमिनीयन स्टेटस की जगह पूर्ण स्वराज की मांग की थी।
  • भगत सिंह शादी नहीं करना चाहते थे, जब उनके माता - पिता उनकी शादी की योजना बना रहे थे तब वह घर छोर कर कानपुर आ गए थे और तब उन्होंने कहा था “अब तो आजादी ही मेंरी दुल्हन बनेगी”
  • कॉलेज के दिनों में भगत सिंह एक अच्छे अभिनेता भी थे उन्होंने बहुत से नाटकों में  भी हिस लिया था और भगत सिंह को कुस्ती का भी शौक था
  • भगत सिंह एक अच्छे वक्ता और लेखक थे। उन्होंने अखबारों में खूब बेनामी तथा अन्य नामों से लिखा
  • भगत सिंह ने अमेंरिका इतिहास भी पढ़ था।
  • हिन्दू-मुस्लिम दंगो से दुखी होकर भगत सिंह ने घोसन की थी की वह नास्तिक है।
  • भगत सिंह हमेंशा भारतीय एकता पर बल देते थे। साथ ही कहते थे की मेंरे लिय सभी धर्म एक समान है।
  • भगत सिंह का मानना था की हमें आजादी सिर्फ अंग्रेजों से नहीं बल्कि हमारे भारतीयों की बभ्राष्टाचारी सोच से भी चाहिए। तभी दबे कुचले लोगों को उनका हक सही अर्थों में मिल पाएगा।
  • “इन्कलाब जिंदबद” का नरा भगत सिंह ने दिया था।
  • भगत सिंह के दल के जीतने भी क्रांतिकारी थे उन्हे कॉमरेट बोला जाता था। लेनिन के बोलशविक मूवमेंट के समय यह शब्द बहुत प्रचलित हुआ था।
  • महात्मा गांधी चाहते तो भगत सिंह की फासी रुकवा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
  • भगत सिंह के नाम पर पाकिस्तान में बहुत सारे मौहले और सरकों का नाम रखा गया है।
  • बटूकेश्वर दत ने कहा था की भगत सिंह बहुत बरे जिद्दी है वो अपनी बात को मनवाकर ही रहते है।
  • भगत सिंह को आज भी शाहिद की उपद्धी नहीं दि गई है। बल्कि आतंकवादी के रूप में  दर्शाया जाता है।
  • कुछ लोगों की मांग है की हमें भगत सिंह को राषट्र पुत्र की उपाधि दि जानी चाहिए।
  • मोहम्मद आली जिन्ना ने अपने तर्कों से अदालत में ये साबित करने की पूरी कोशिश कि थी, की भगत सिंह और उनके साथी हथियारे नहीं है बल्कि वह तो राजनीतिक क्रांतिकारी है और उनको फासी की सजा सुनाना पूरी तरह से नाइंसाफ़ी है।
  • कलकता में जब भगत सिंह और दुर्गा भाभी ने एक साथ समय बिताया तो दुर्गा भाभी को लगा की भगत सिंह दिल के भी बहुत अच्छे इंसान है, क्योंकि इससे पहले उन्हे लगता था की भगत सिंह सिर्फ एक क्रांतिकारी है लेकिन बाद में दुर्गा भाभी को पता चला की भगत सिंह तो लोगों से बहुत प्रेम करते है, वह सिर्फ घ्राण करते है तो सिर्फ लोगों के अंसगत और कुविचारों से।
  • भगत सिंह गांधी जी को बहुत ही सम्मान की दृष्टि से देखते थे लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ प्रेम पूर्वक तरीके से समझौता करने को लेकर हमेंशा विरोध करते थे।
  • जवाहर लाल नेहरू ने भगत सिंह को लेकर सभी के सामने बोल था की भगत सिंह इस देश के वीर पुत्र है।
  • केन्द्रीय असेंबली में बम फ़ैकने की योजना आगरा में बनाया जाता है, शुरू में योजना यह थी की राम शरण दास और बटूकेश्वर दत को बम फ़ैकने के लिय चुना जाता है। लेकिन भगत सिंह अपने आप को चुनते है इस योजना के लिय और शुखदेव थापर उनका समर्थन भी करते है की हम जिस मकसद के लिय इस इस घटना को अंजाम देना चाहते है उसके लिय आप से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता है।
  • भगत सिंह के बम फैक कर नहीं भगने का एक कारण यह भी था की भगत सिंह देश की जनता को बतान चाहते थे की मेंरे जैसा क्रांतिकारी कोई आतंकवादी नहीं है। इस विचार को सभी लोगों तक पहुचने का मुख्य द्वार भगत सिंह को बम फ़ैकने का विचार ही लगता था। क्योंकि वो अदालत को एक मंच के रूप मे प्रयोग करना चाहते थे।
  • भगत सिंह को काभी भी किसी ने गलत नहीं कहा, नरम पंथी विचारधारा रखने वालों ने भी नहीं कहा सिर्फ कहा की उनके तरीके गलत है ना की भगत सिंह। क्योंकि उन्हे भी पता था की सभी इस देश को आजादी दिलाने के लिय अपने अपने तौर तरीके अपना कर अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे है।
  • भगत सिंह ने अपनी डायरी के आखिरी पन्ने में अपने अंतिम विचार रखते हुए 23 मार्च को लिखा की फासी के 15 साल बाद हम यानि भारतवसी अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो जाएंगे, 15 साल जी बजाए आजादी में 18 साल लग गया और देश 1947 को आजाद हो गया। उन्होंने लिखा था की आजादी के बाद भी हमारे देश में भ्रष्टचरियों का राज होगा। आजादी का मतलब है अन्याय और शोषण पर टिकी हमारी व्यवस्था को बदलना पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते है बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की धार पर तेज होती है” भगत सिंह ने सम्प्रदाईक हिंसा के खिलाफ भी अपनी डायरी में  लिखा था धार्मिक अंध विश्वास और कट्टरपंती के वो हमेंशा खिलाफ थे। आजादी के वो ऐसे परवाने थे ऐसे मतवाले थे की वो सिर्फ बम धमाके और बंदूक में विश्वास नहीं रखते थे, कलम के भी वो उतने ही बारे शिपही थे और फिर अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ ही नहीं बल्कि उन्होंने हर तरह के शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद कड़ी और देश वासियों को सतर्क किया।
  • जेल में जब भगत सिंह की चाची हरनाम कौर उनसे मिलने आई तो जिस बच्चे को उन्होंने बारे ही प्यार से अपने गोद में खिलाया था उसकी ये हालत देख कर वह स्वम को रोक नहीं पाई और रोने लागी भगत सिंह एक पल के लिय विचलित हुए चाची को इस तरह से रोता देख कर लेकिन अगले ही पल उनका चेहरा तमतमा उठा और चाची से बोले की आप रो सकती है आपको रोते देख मुझे भी रोना आ सकता है मैं भी तो आखिर एक इंसान हु लेकिन मैं नहीं रो सकता क्योंकि अगर मैं रो दिया तो ये देश टूट जाएगा उसके साथ ही देश्वसियों के सपने टूट जाएंगे फिर आजादी और क्रांति की सारी उम्मीदे खत्म हो जाएगी। इसलीय भगत सिंह आखिर तक काभी नहीं रोए उस दिन भी नहीं जब उनको फासी दिया जाने वाला था।
  • भगत सिंह को फिल्मे देखना और रसगुले खाना काफी पसंद था वे राजगुरु थापर और यशपाल के साथ जब भी मौका मिलता था, फिल्म देखने चले जाते थे, उन्हे चार्ली चैपलिन की फिलम बहुत पसंद थी। इस पर कई बार चंद्र शेखर आजाद बहुत गुस्सा भी होते थे। इस फिल्म देखने की आदत से चार्ली चैपलिन को तो वो 4 फुट का नौटंकीबाज कहते थे। दरअसल भगत सिंह और उनके साथियों को चार्ली चैपलिन इसलीय पसंद थे क्योंकि वो दौर एक खास तरह की तानाशाही का दौर था दुनिया में खासतौर पर जर्मनी जैसे देश में भी लोग खौफ़जदा रहते थे और समय एक कलाकार ऐसा था जो सब लोगों का उस समय भी डर मिटा के उनके चहरे पर खुशिया लाता था और अपने खूब सूरत काम से लोगों को एक अलग कल्पना की दुनिया में ले जाया करता था। इस लिय भगत सिंह खुद एक बहुत अच्छे कलाकार थे। उन्होंने न सिर्फ अपने कॉलेज में एक नाट्य सुसाइटी की स्थापना की थी बल्कि वह खुद भी कई नाटकों में नायक की भूमिका निभाते थे। जैसे राणा प्रताप में  उन्होंने राणा प्रताप की भूमिका निभाई।
  • भगत सिंह की इछा थी की उन्हे अपराधी की तरह फासी पे चढ़ा कर नहीं, बल्कि युद्धबंदी की तरह गोली मार कर मौत दि जाए लेकिन ब्रिटश सरकार ने उनकी इस इछा को भी नजरंदाज कर दिया।

भगत सिंह की याद में

सिस्टम को लेकर के भगत सिंह की विचारधारा को निखारने के लिय लहौर शहर की जनता का बहुत बारा हाथा था। DAV स्कूल से पास होकर भगत सिंह ने ब्रैड लो हॉल के नैशनल कॉलेज में दाखिल लिया था यह जगह लाहौर शहर की राजनीतिक विचारधारा का गढ़ था इसीलिए भगत सिंह ने यहा पर अपने मित्रों के साथ मिल कर नौजवान भारत सभा बनाई, कई सारी गतिविधिया की ड्रामा में भाग लिया और फिर इंकलाब का नर लाए।

भगत सिंह यूनाइटेड इंडिया / प्री पाकिस्तान के हीरो थे और उनकी पार्टी में हिन्दू, मुसलमान और सिख सभी धर्मों के लोग थे उसमें कोई जातपात और न ही कोई मजहबी उच्चनीच था।

जिस रात भगत सिंह को फासी देनी थी उस रात जेल के कैदियों ने अपनी हथकारियों और जंजीरों को सलाखों के साथ इतनी ज़ोर से मारी और इतनी ज़ोर से नारों की आवाज आ रही थी की जो लोग लाहौर जेल के आसपास रहते थे उन लोगों ने सारी रात वो आवाजे सुनी और पूरी रात अपने छतों पर गुजरी, की इतना शोर क्यों आ रहा है।

जिस जगह भगत सिंह को फासी दि गई थी वो आज सादमान चौक कहलाता है लाहौर में वहा पर पहले सेंट्रल जेल होता था और फासी घाट जहा पे भगत सिंह को फासी दि गई।

लाहौर की जनता ने कुछ समय बाद अपनी ईछा जाहीर कि, की इस जगह का नाम जो सादमान है उसको बदल कर भगत सिंह चौक रख दिया जाय। क्योंकि हर साल हम सब यहा पर मिलकर उनकी शहादत को नमन करते है और उनके याद में उत्सव आयोजित करते है, और हुकूमत तथा नई पीढ़ी को याद दिलते है की हम लायलपुर का नाम बदल कर अरब बदशा के नाम पर रख सकते है तो हम सादमान चौक को भगत सिंह चौक क्यों नहीं रख सकते है।

जब भगत सिंह की पहली जयंती पर लाहौर में जुलूस निकाला उनके चाहने वालों ने तो वहा पर एक एक तांगेवाला था तायर लाहौरी उसने अपने तांगे पर खरे होकर एक कविता पढ़ी भगत सिंह की याद में जिसके बोल कुछ इस तरह के थे:-

“35 करौर तेरे जंजी वे लरिया पैदल ते कई असवार”

“मौत कुरी नु प्रणावन चलिया देश भगत सरदार”

यानि भगत सिंह एक दूल्हा है जो अपनी दुल्हन रूपी मौत है उससे गले मिलने के लिय जा रहा है।।

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