फासी एक दिन पहले देने के
गंभीर कारण क्या थे?
कहा जाता है की भारत वर्ष में 6 लाख 32 हजार क्रांतिवीर थे जिन्होंने अपनी कुर्बानी दि थी। भगत सिंह उनके सर्वोच्च शिखर
पर है ऐसा पूरा देश मानता है। शाहिद - ए - आजम का खताब भगत सिंह को मिला ऐसा पूरे देश की तरफ से उनके लिय भवना
थी।
अंग्रेजों की सरकार ने भगत सिंह को फासी देने का फैसला 24 मार्च 1931 को तय किया था लेकिन भगत सिंह
को फासी देने का फैसला एक दिन पहले क्यों ले लिया गया। यह एक विचार करने वाला
गंभीर विषय है। की एस क्यों किया गया बिना किसी को बताए। क्योंकि अंग्रेजों ने
अपने ही कानून का उल्लाघन किया भगत सिंह को फासी देने में। क्योंकि फासी तो सुबह
के समय ही दिया जाता है एस कानून तो अंग्रेजों ने स्वम ही बनाया था। जो की दुनिया
के सभी देशों में यही कानून है।
“लेकिन 24 मार्च की सुबह 6 बजे
फासी न देकर 23 मार्च की शाम 7:30 बजे ही क्यों फासी दि गई।”
इसके पीछे का कारण हमें अवश्य ही जानना चाहिए। अंग्रेजों के संसद
लंदन के हाउस ऑफ कॉमेंस से मिले दस्तावेज की आधार पर
हमें पता चलता है की भगत सिंह को फासी देने से अंग्रेजों की सरकार बहुत घबराई हुई
थी। अंग्रेजों के सांसद में विशेष अधिवेशन बुलाया गया और उस पर चर्चा हुई।
चर्चा दो स्तर पर थी – पहली तो यह की क्या भगत सिंह
की फासी को माफ किया जा सकता है अंग्रेजों की संसद के अंदर कुछ सांसद थे जो ये
सवाल उठा रहे थे उनका कहना था की भगत सिंह को अगर फासी हो गई तो भारत में बगावत हो
जाएगी और फिर हिंदुस्तान में एक नहीं एसे कई हजारों भगत सिंह का जन्म हो जाएगा तब
अंग्रेजों की सरकार को उन सब को दबाना बहुत ही भारी पर जायगा। हम हिंदुस्तान में
राज नहीं कर पाएंगे हो सकता है की हमको एक दो महीने के भीतर में ही भारत छोरना पर
जाए।
ऐसा उनको इसलीय लगता था क्योंकि अंग्रेजों की सरकार के लिए
जासूसी करने वाली एक संस्था जो अंग्रेजों ने स्वम भारत में बनाई थी। जो आज भी चलती
है जिसको हम सब LIU की नाम से भी जानते है अथार्त Local Intelligence Unit जो की अंग्रेजों द्वारा बनाई गई संस्था है।
तो LIU की रिपोर्ट इंडिया से जा रही
थी लंदन नियमित रूप से, जैसा की हम जानते है की फासी
देने का फैसला तो हो गया था लगभग दो ढाई साल पहले ही और उन दो ढाई सालों में लगातार भारत से रिपोर्ट जा रही थी LIU की और वो रिपोर्ट यह कहती है
की अगर भगत सिंह को फासी होती तो सारे भारत में एक साथ बगावत होगी और उस समय
अंग्रेजों को मुश्किल होगा राज चलाने में। तो अंग्रेजों की सांसद में इस बात का
बहुत ही डर था उसी समय संयोग से 1930 और 1931 में महात्मा गांधी लंदन गए हुए थे अंग्रेजों
की सरकार से वार्ता करने। अंग्रेजों का उस समय का जो सबसे बरा नेता / व्यक्ति तथा
लीडर था वो वायसराय लॉर्ड इरविन ही थे। इरविन के साथ जब बातचित
चल रही थी तो इरविन ने गांधी जी को कहा की आप अगर चाहे तो हम भगत सिंह की सजा को
माफ कर सकते है।
गांधी जी को इरविन की शर्त
गांधी जी ने कहा बिना किसी शर्त, इरविन ने
बोल की हमारी एक ही शर्त है की आप भगत सिंह को निवेदन करे और बोले की भगत सिंह एक माफीनामा लिखे। “Sorry I Am Very
Sorry मैने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत
की है मुझे इस बात का बहुत ही अफसोस है दुख है मैं आगे ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा” इस तरह का एक माफीनामा लिखे “जीस पर भगत सिंह के हस्ताक्षर
भी हो”, और मेंरे सामने आप उसे प्रस्तुत करे ऐसा इरविन गांधी को बोलते है, तो मैं अपनी संसद को कहूँगा की वो भगत सिंह की सजा को माफ करे।
तब गांधी जी जवाब में कहते है की मैं ऐसी कोई भी
शर्त मान नहीं सकता जिसके बारे में भगत सिंह का मेंरे पास कोई Consent न हो। तब इरविन ने कहा की आप भगत सिंह से Consent ले लीजिए समय आपके पास एक साल का है। गांधी जी ने जवाब दिया मैं
अभी तुरंत ही 2/4 दिन की मौहलत चाहता हु क्योंकि मैं एक टैलिग्राम करूंगा अपने एक
मित्र को जो लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह को मिलेगा और आपने जो कहा है वो बाते, मैं भगत सिंह तक पहुचेंने की कोशीश करूंगा, अगर बात बनती है तो हम इस विषय पर आगे की वार्ता को जारी रखेंगे।
गांधी जी का सपरू को
टैलिग्राम
गांधी जी ने एक टैलिग्राम किया भारत देश के एक अच्छे व्यक्ति साथ
ही जो एक महत्वपूर्ण व्यक्ति है जिनका नाम था तेज बहादुर सपरू जो की अलहाबाद कोर्ट में बहुत ही उच्चे दर्जे के वकील थे साथ ही
एक कश्मीरी थे। जब गांधी जी का टैलिग्राम सपरू जी के पास पहुचा तो सपरू ने उसे पढ़ा
जिसमें गांधी जी कहते है की आप तुरंत ही भगत सिंह के पास जाओ और इरविन की शर्त के
बारे में उन्हे बताओ।
जब सपरू ने भगत सिंह को मिलकर यह जानकारी दि तो उन्होंने कहा की
मुझे कोई भी शर्त अंग्रेजों की मंजूर नहीं है मैं नहीं मानता की मैने कोई गलत काम
किया है इसलिए माफीनाम लिखने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है। सपरू जी ने अपनी तरफ
से समझाया की अगर आपकी फासी रुक जाएगी और आप जेल से छूट जाओगे तो आपके जैसे कितने
क्रांतिकरी है जिनको आप Training दे कर तैयार कर सकते हो जिससे भारत की आजादी जल्द ही आएगी।
तब भगत सिंह ने उनकी बात को काटते हुए कहा की नहीं इसका उलट होगा, अगर मैं छूट गया मेंरी फासी की सजा माफ हो गई या मैने कोई भी
माफीनामा लिख कर अंग्रेजों को दे दिया, तो ये जो पूरे भारत में बगावत
का अभियान शुरू हुआ है ये रुक जाएगा पूरा का पूरा अभियान ही ठंडा पर आएगा दूसरा
कोई भगत सिंह इसमें से निकल कर ही नहीं आएगा।
सपरू ने कहा की क्यों, तो भगत सिंह ने कहा की
हिंदुस्तान की एक खसियत है, की वो मरने से नहीं डरते है, लेकिन मरने से पहले का जो दर्द होता है उससे डरते है उसे
हिन्दुस्तानी सह नहीं सकते है जो की बहुत ही गहरी बात है मरने से तो भारतवासी नहीं
डरते है एक मिनट में मृत्यु आजाए उससे कोई फरक नहीं परता, लेकिन मृत्यु आने के पहले का जो दर्द होता है वो उनकी तकलीफ बढ़ा
देता है।
मैं भी ऐसा ही एक हिन्दुस्तानी हु मैं मेंरी तकलीफ बढ़ाना नहीं
चाहता, मैं तय कर चुका हु की मुझे फासी हो जाए कोई फरक नहीं परता सपरू
जी का 3 बार आना हुआ लाहौर जेल में सिर्फ माफीनामें की बात को समझने के लिए।
सपरू का गांधी जी से अनुरोध
उन्होंने देख लिया की वो तैयार नहीं है और फिर सपरू जी ने वापस
गांधी जी को टैलिग्राम किया और कहा की बापू भगत सिंह का यह मानना है की उनको फासी
हो जाए वही भारत देश के लिय और उनके अपने संकल्प के लिय अच्छा है। आपसे अनुरोध है
की आप इरविन के साथ कोई भी बात अगर करे तो माफीनामें का शब्द बीच में न लाए
क्योंकि वो लिखने को तैयार नहीं है और हम में से भी कोई नहीं चाहता की वो माफीनामा
लिख के दे। क्योंकि मानते है हम उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है उन्होंने अपने भारत
की आजादी के लिय किया है भारत इस समय ठंडा परा हुआ है।
1919 में एक ज्वाला उठी थी जलीयवाला बाग हत्याकांड के रूप में, उसी समय अगर हम चाहते तो अंग्रेजों को भारत से मार कर भगा देते
लेकिन हमने उस अवसर का फायदा नहीं उठाया। ऐसी ही ज्वाला 1857 में उठी थी भारतवासीयो ने तब
भी उसका पूरा लाभ नहीं उठाया हम चाहते तो 1857 में ही अंग्रेजों को मार कर भगा देते। फिर वे कहते है ऐसी ही एक
ज्वाला 1880 में उठी थी हम चाहते तो 1880 में अंग्रेजों को मार भगा देते
लेकिन वो भी समय हमने गवा दिया और अब फिर से ज्वाला उठने की तैयारी है इसको ठंडा
मत होने दीजिए और कृपया करके इरविन के साथ भगत सिंह के माफीनामें पर बातचित बंद कर
दीजिए।
लंदन का इंडियन हाउस
गांधी जी को टैलिग्राम मिल तो उन्होंने लंदन में एक मीटिंग बुलाई
उस मीटिंग में वो सब क्रांतिकारी शामिल थे जो लंदन में रहकर भारत की आजादी के लिए
काम करते थे। उनके सबसे बरे नेता थे श्याम जी कृष्ण वर्मा उन्होंने एक बहुत बरा भवन बना के दिया लंदन में जहा पर सभी क्रांतिकारी
जाते थे और Traning करते थे वैचारिक मंथन होता था और भी कई सारी व्यवस्था वहा थी
जिसका नाम उन्होंने रखा था इंडियन हाउस जीसेमे शयम जी कृष्ण वर्मा और उनके जैसे कई क्रांतिकारी मौजूद थे।
गांधी जी ने सब से पूछा की इरविन का प्रस्ताव है क्या करना है तो
अन्य लोगों ने कहा की इरविन बहुत ही चलाक आदमी है और अंग्रेजों की सरकार बहुत
खतरनाक है तो भगत सिंह से जो माफीनामा वो चाहते है लिखवाकर वो सिर्फ अपनी सुरक्षा
के लिय लेना चाहते है। भारत की आजादी की लिए नहीं क्योंकि अंग्रेजों को डर है की
अगर भगत सिंह को फासी हुई तो बगावत इतनी बरी होगी की व्यवस्था उलट पलट जाएगी सेना, आर्मी, नेवी, एयर फोर्स और पुलिस में भी एकसाथ बगावत हो सकती है।
क्योंकि भगत सिंह का मुकदमा जीतने दिन भी अदालत में चला, उतना ही उनकी लोकप्रियता बढ़ती
चली गई और भगत सिंह की लोकप्रियता भारत में ही नहीं बल्कि भारत के बाहर जो रहने
वाले भारतवासी थे वहा तक पहुच गई तो उस लोकप्रियता से अंग्रेज डरते थे।
LIU की आखिरी
रिपोर्ट
अंग्रेजों ने संसद में एक विशेष बैठक बुलाई और उसमें उन्होंने
फैसला किया की अगर भगत सिंह को फासी हुई तो उनके जो परिवार के लोग है उनके जो
मित्र है रिश्तेदार है वो उनका मृत शरीर मांगेंगे और उस मृत शरीर को जुलूस की तरह
से वो एक रैली निकलेंगे साथ ही सम्मान सहित उनका अंतिम संस्कार करेंगे और जिससे
ऐसी भवना भरकेगी अंग्रेजों के खिलाफ की शायद पंजाब से हमे तुरंत ही भागना परे हो
सकता है की भारत का एक बहुत बरा हिस्सा हमें खली करना पर जाए तो अंग्रेजों
की संसद में जब इस विषय पर बहस हो गई और LIU की आखिरी रिपोर्ट भी आ गई
जिसमें था की अगर भगत सिंह को फासी दि गई और उनका अंतिम संस्कार सम्मान के साथ
करने का मौका नागरिकों को मिलता है तो ये तय है की पूरा पंजाब जलेगा और अंग्रेज
सरकार बच नहीं पाएगी अपने आपको क्योंकि अंग्रेज सरकार के नीचे काम करने वाले जो
हिन्दुस्तानी है उन्होंने संकल्प ले रखा है की वो बगावत शुरू करेंगे एक LIU अफसर ने तो यह तक लिख दिया की 1857 में भरतवासियों से एक गलती हो
गई थी वो हमारे लिय बरी अच्छी हुई और भरतवासियों को भारी पारी।
वो गलती कुछ इस तरह थी की 1857 का क्रांति वाला जो संग्राम था उसको एक साथ शुरू करने का फैसला
हुआ था और उसकी एक तारीख तय की गई थी लिकीन हमारे भारत के अति उत्साही
क्रांतिकारियों के कारण उस तारीख से 10/11 दिन पहले ही क्रांति शुरू हो गई तय हुआ
था एक दिन 10 मई 1857 लेकिन कही पर 30 अप्रैल, कही पर 1 मई, कही पर 2 मई इस तरह से अलग अलग
बगावते शुरू हो गई बैरकपुर की छावनी में अलग तारीख को कलकता में अलग, मेंरठ में अलग, दिल्ली में अलग।
इस तरह की अलग अलग शुरू हुई क्रांति को अंग्रेजों ने आर्मी
सहायता से आसानी से दबा लिया जो एक साथ 10 मई को शुरू होता तो अंग्रेजों की ताकत
नहीं थी की वो उसको दबा पाते, LIU के अफसर ने लिखा ब्रिटिश संसद
को, जो गलती हो गई हिंदुस्तान के लोगों से 10 मई 1857 को वो गलती अब वो ठीक करना
चाहते है। भगत सिंह की फासी के दिन ही सभी जगह एक साथ बगावत होगी अंग्रेजों के
खिलाफ, हिंदुस्तान के लोगों को मरने का डर दिखा कर गुलाम नहीं बनाया जा
सकता है, तो आप कुछ ऐसा करिए की ये बगावत न होने पाए तब अंग्रेजों की संसद
में प्रस्ताव पारित करके भारत में अंग्रेज अधिकारियों को आदेश दे दिया गया की किसी
भी तरीके से पता न चले लोगों को एसे करके फासी दे दीजीए।
फासी से एक दो दिन पहले देश में चल रहे फासी विरोधी आंदोलन ने के
कारण एक ऐसी जबरदस्त क्रांति का माहौल हो गया, मानो पूरा मुल्क जैसे उबल रहा
था। भारत के लोग खासकर नौजवान घरों से निकलकर सरको पर आ गए थे प्रदर्शन और आंदोलन
का वह दौर जबरदस्त था जगह - जगह जनसभाए हो रही थी अंग्रेज सरकार और चिंतित हो गई।
तब जेल के अधिकारियों ने लाहौर के सुपरीटेंडेंट से कहा की इसका
एक ही विकल्प है की हम एक दिन पहले रात में ही भगत सिंह को फासी पर लटका देंगे, फिर सुपरीटेंडेंट ने पूछा उसके बाद, अधिकारियों ने कहा की फासी के कुछ मिनटों बाद हम तीनों के शव को
लेकर जाएंगे और जेल के बाहर ही किसी स्थान पर नदी के किनारे आग लगा कर जला देंगे
रात भर में शव जल जाएगा सुबह तक जब लोग आएंगे फासी के समय पर तब उन्हे सिर्फ राख
ही मिलेगी इस चालाकी और कुटिलता के साथ 23 मार्च को उन तीनों वीरों को फासी दे दि
गई।
ट्रक ड्राइवर का साहसी
पराक्रम
फासी के बाद तीनों के शवों को एक ट्रक में रख कर जेल से बाहर
निकाला और उस ट्रक ड्राइवर को कुछ भी नहीं बताया गया की इसमें क्या है उसे सिर्फ
ये कहा गया की तुमको ये ट्रक लेके जाना है पिछे ट्रक में कुछ लोग बैठे है उनसे तुम
कुछ भी नहीं पूछोगे वो कुछ काम करेंगे और तुम्हें उनकी सहायता करनी है संवाद नहीं
करना है। ट्रक ड्राइवर को शक हो गया की ऐसा क्या है की मैं बात नहीं कर सकता, जबकि मैं तो अक्सर जेल के लिय सब्जिया लाता हु। उसके मन में
गंभीर शक पैदा हो गया और उसने किसी तरह से ये जानने की कोशीश की की आखिर ये माजरा
है क्या जब उसने ट्रक को दौराना शुरू किया तो एक जगह बहाने से उसने रोक कर कहा की
ट्रक में कुछ गरबारी हो गई है मुझे जरा ठीक करने में समय लगेगा। वो ट्रक से उतरा
और घूम कर पीछे को गया और उसने देखा की कोई मृत शरीर कपरे में लपेटा हुआ है जिसको
मैं ले जा रहा हु तो पीछे बैठे हुए एक हिन्दुस्तानी सिपाहि से उसने जानने की कोशीश
की और उसने पूछा की ये क्या है कपरे में लपेटा हुआ तो सिपाही ने कहा की तुमको क्या
लेना देना, नहीं मुझे जानकारी देदो हम दोनों ही भारतवासी है हमारी तकलीफ ये
है की पेट के लिय इन अंग्रेजों की नौकरी करनी पर रही है तो बता दो ये क्या है तब
सिपाही ने भावुक होते हुए कहा की ये भारत के सरदार भगत सिंह का शव है तब ट्रक वाला परेशान हो गाया और उछलते हुए पूछा की ये
कैसे हुआ फासी तो कल होनी है, तो सिपाही ने कहा नहीं अंग्रेज
सुपरीटेंडेंट ने रात को फासी दे दि है, अब क्या करना है, अब हमें आदेश है की लकरिया इकठठा कर सतलुज नदी के किनारे इन्हे
जला देना है।
फिर उस ड्राइवर को सरा माजरा समझ में आगया उसने कहा ठीक है मैं
उस स्थान तक आप लोगों को लेकर जाता हु और इतनी ही देर में उसने योजना बना ली लाहौर
से ट्रक को भगात हुआ वो लाया और हुसैनीवाला पहुचा, जो की अमृतसर के नजदीक है।
(भारत पाकिस्तान के बॉर्डर पर)
हुसैनीवाला पहुच कर लकरिया इकठी करनी है कहकर बहाने से ट्रक वाले
ने आसपास के लोगों को इस घटनाक्रम की जानकारी दि। तब लोग वहा से दौरे और अंग्रेजों
का पीछा करते हुए वो सभी लोग ट्रक तक पहुचे। इधर अंग्रेजों ने शवों में आग लगाई ही
थी की क्रोधित लोगों का शोर सुन कर अंग्रेज वहा से अपनी जान बचा कर भाग गए।
इस प्रकार भगत सिंह और उनके साथि शिवराम राजगुरु तथा सुखदेव थापर के शवों का सम्मान सहित अंतिम संस्कार हुसैनीवाला में करने का बहुत बरा पराक्रम उस ट्रक ड्राइवर ने किया। हुसैनीवाला में आज भी तीनों वीरों की समाधि है।

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